May 25, 2026

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IIM रायपुर में पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर पर आयोजन

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देश के सबसे बड़े प्रबंधन संस्थान IIM रायपुर(इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट) में देश के विभिन्न प्रदेश से आए विद्यार्थियों ने अहिल्याबाई होल्कर के कार्यो से सीखा प्रबंधन

रायपुर। भारतीय प्रबंधन संस्थान ,अटल नगर रायपुर ( IIM -R)में पुण्य श्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के जन्म त्रिशताब्दी समारोह के अवसर पर व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. टोपलाल वर्मा जी एवं संस्थान के कुलसचिव कर्नल हरिन्द्र त्रिपाठी जी ने पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पण किए उसके उपरांत शास्त्रीय संगीत से लयबद्ध सरस्वती वंदन एवं मातृभाषा से परिष्कृत मंच संचालन के साथ कार्यक्रम का विधिवत आरंभ हुआ।

मुख्य वक्ता डॉ टोपलाल जी ने लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जी के जीवन के कुछ प्रमुख बातें भी बतायें –

अहिल्याबाई होलकर पूरे 18 विधाओं में निपुण थी।

वे 28 वर्षों तक कुशल प्रशासक रही।

शिवाजी महाराज का राज्य अष्ट प्रधान होता था, अहिल्याबाई होल्कर जी ने 37 प्रधान बनाए।

पूरे मालवा में गुरुकुल की स्थापना की।

अनुसंधान को बढ़ावा देते हुए 19अध्येताओं की नियुक्ति किए।

इस युग में केवल एक को ही पुण्य श्लोक की उपाधि।
इसके पूर्व राजा नल,युधिष्ठिर को यह उपाधि।

कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। पर किसी ने यदि किया तो उसे छोड़ा भी नहीं।

पुत्री का विवाह जनजातीय युवक से किया। आतंकियों को मालवा से मुक्त करवाने की शर्त पर।

इतने समय के बाद भी भारत जीवित है तो अपने इन्ही सांस्कृतिक मूल्यों के कारण जीवित है।
मुख्य वक्ता डॉ. टोपलाल वर्मा जी ने लोकमाता के जीवन के कुशल संयोजन, लोक प्रशासन, न्याय, कर्मठता ,दूरदर्शिता, समरसता और पर्यावरण जैसे विविध पहलुओं को लेकर विषय का सुंदर व सुगठित स्वरूप छात्रों के समक्ष रखा। उत्तर से लेकर दक्षिण, पूरब से लेकर पश्चिम अर्थात् केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम,सोमनाथ से लेकर जगन्नाथ पुरी तक माता अहिल्या के द्वारा मंदिरों का जीर्णोद्धार कर समूचे भारतवर्ष को सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया।

केवल जीर्णोद्धार ही नहीं अपितु मानव धर्म को सर्वोपरि मानते हुए प्रत्येक स्थान पर धर्मशालाओं एवं भोजनालयो की भी व्यवस्था की। बाल्यकाल से ही कुशल संयोजन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए सैन्य कार्यों में निपुणता प्राप्त की। बालिकाओं को शास्त्र और शस्त्र दोनों की समानांतर शिक्षा प्रदान करने को महत्व दिया। पूरे देश में गुरुकुल की स्थापना की। अनुसंधान को बढ़ावा देते हुए 19 अध्येताओं की नियुक्ति की।अनुशासन और न्याय सर्वोपरि ऐसा मानने वाली अहिल्या माता उनके समक्ष अपने अधिकारी या पुत्र को भी दंड देने से परहेज नहीं करती थी।

समय का प्रबंधन हो या समाज का प्रबंधन संपूर्ण कुशाग्रता और कुशलता से करती थी। माता अहिल्याबाई होलकर अथक और अनवरत कार्य करते थे। पूर्ण अनुशासन के साथ अपना जीवन व्यतीत किया। विरोधी एवं प्रतिद्वंदी भी उनके न्याय पर विश्वास कर न्याय का प्रतीक मानते थे । भारत की तटस्थ नीति हो या नवाचार की नीति हो या फिर सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से रोजगार को समृद्ध करने की प्रवृत्ति आज से ढाई सौ वर्ष पूर्व माता अहिल्या ने इसका शुभारंभ अपनी दूरदर्शिता से किया। पर्यावरण संरक्षण के दिशा में अभूतपूर्व कार्य किए।

विधवाओं और जनजाति समाज के उत्थान एवं विकास के लिए उनके कुशल लोक प्रशासन आज भी स्मरणीय हैं। अपनी पुत्री के वर के रूप में उन्होंने जनजाति समाज के योद्धा को उसके गुणों के आधार पर चयन किया उसके अर्थ के आधार पर नहीं। पुण्य श्लोक के उपाधि सदीयों में किसी एक को प्राप्त होती है राजा नल और युधिष्ठिर के उपरांत इस उपाधि से अलंकृत लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का जीवन केवल सुनने या क्षण मात्र समझने का नहीं अपितु राष्ट्र निर्माण की दिशा में आत्मसात करने का विषय है। मुख्य वक्ता जी ने कहा वर्ष 2047 में हम विकसित भारत का ध्येय लेकर आगे बढ़ रहे हैं । आज भारत सभी विकार चाहे वह धारा 370 हो या अन्य , कुशलता से विजय प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में इस परिपेक्ष में लोकमाता अहिल्याबाई का जीवन दर्शन हम सभी के लिए प्रेरणास्पद नहीं अपितु अनुकरणीय हैं जो राष्ट्र पुनर्निर्माण को नव दिशा प्रदान करता है।

मुख्य वक्ता महोदय के सारगर्भित उद्बोधन के दौरान पूरा प्रबंधन संस्थान का सभागार सूक्ष्म ध्वनि से विरक्त लोक माता के जीवन के प्रबंधन के समस्त पक्षों से एक चित्र सा अवगत होता रहा।

कार्यक्रम में कुल 300 विद्यार्थी और 5 प्राध्यापक उपस्थिति थे। कार्यक्रम में श्रीमती वर्णिका शर्मा एवं श्री संजय जोशी विशेष स्थिति के रूप में सम्मिलित हुए।

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